ISHITA: Ek Adhoora Ehsaas

साल 2009… मेरा कॉलेज का दौर। उसी साल मेरी जिंदगी में एक लड़की आई — इशिता। एक दोस्त के रूप में हमारी पहचान हुई, लेकिन धीरे-धीरे वो मेरे लिए सिर्फ एक दोस्त नहीं रही। उसके साथ बैठकर बातें करना, कैंटीन में साथ कॉफी पीना, आईटी पार्क की सीढ़ियों पर उसके पास बैठना… ये सब मेरी दुनिया का हिस्सा बन गया था।


हर दिन उसकी हंसी मेरे दिल को सुकून देती थी। उसका मुस्कुराता चेहरा देखना जैसे मेरी सबसे बड़ी खुशी बन चुका था। शायद मुझे तब ही समझ जाना चाहिए था कि ये सिर्फ दोस्ती नहीं है, कुछ और भी है… कुछ गहरा।


फिर एक दिन, मैंने हिम्मत जुटाकर अपने दिल की बात उसे कह दी। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, हाथ कांप रहे थे, लेकिन मैं अपने जज़्बातों को और दबा नहीं सका।


मैंने कहा, "इशिता, मैं तुम्हें पसंद करता हूं… शायद इससे भी ज्यादा।"


उसने मेरी आंखों में देखा… थोड़ी देर खामोश रही, फिर बड़े ही सधे हुए शब्दों में बोली —

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